ऊँचे-ऊँचे हिमालयी पर्वतों के बीच बसा एक राज्य, जिसे ‘देवभूमि’ भी कहा जाता है। उत्तराखंड… यह केवल पहाड़ों और घाटियों की भूमि नहीं, बल्कि उन जीवनदायिनी नदियों का उद्गम स्थल है, जिन्होंने भारतीय सभ्यता को सदियों से पोषित किया है। यहाँ हर नदी की अपनी कहानी है, जो आस्था, प्रकृति और जनजीवन से गुंथी हुई है।
जीवन का प्रवाह: गंगा और यमुना
गंगा, भारत की सबसे पवित्र नदी, यहीं से अपना सफर शुरू करती है। गंगोत्री हिमनद के गोमुख से निकलने वाली भागीरथी और चमोली जिले के सतोपंथ हिमनद से निकलने वाली अलकनंदा, ये दो प्रमुख धाराएं देवप्रयाग में मिलकर ‘गंगा’ कहलाती हैं। दूसरी ओर, यमुनोत्री हिमनद से निकली यमुना, अपने साथ न केवल जल, बल्कि एक गहरी सांस्कृतिक पहचान भी लेकर चलती है। ये नदियाँ राज्य की जीवनरेखा हैं, जिन पर कृषि, तीर्थयात्रा और रोज़मर्रा का जीवन निर्भर करता है। इसके अलावा, काली, रामगंगा, सरयू, पिंडर जैसी कई अन्य नदियाँ भी इस भूमि को उपजाऊ और समृद्ध बनाती हैं।
जब नदियाँ जीवन लेती हैं
परंतु, प्रकृति का यह सौंदर्य कभी-कभी रौद्र रूप भी धारण कर लेता है। जब हिमालय की कोख से निकली ये नदियाँ क्रोधित होती हैं, तो आपदा का मंजर सामने आता है। थराली क्षेत्र में हाल ही में आई आपदा इसकी एक दुखद मिसाल है। भूस्खलन और मलबे से अवरुद्ध रास्ते, टूटते घर और बाढ़ का सैलाब, यह सब नदियों के प्रचंड रूप का परिणाम है। प्रशासन ने इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए लोगों से सुरक्षित स्थानों पर जाने और निर्देशों का पालन करने की अपील की। कुलसारी पॉलिटेक्निक में एक राहत केंद्र भी स्थापित किया गया, जहाँ प्रभावितों को आश्रय दिया गया। यह उस सच्चाई को दर्शाता है कि उत्तराखंड में नदियाँ सिर्फ जीवन देती नहीं, बल्कि प्रकृति के बदलते मिजाज के साथ जीवन को चुनौती भी देती हैं।
आस्था जो कभी नहीं टूटी
इन मुश्किलों के बीच, एक ऐसी कहानी है जो हमें आशा और अटूट विश्वास सिखाती है। आपदा के इस समय में, जब चारों ओर चिंता और आंसुओं का सैलाब था, तब भी मां नंदा राजराजेश्वरी की डोली अपने ससुराल की ओर रवाना हुई। यह परंपरा, जो प्रकृति की कठोर परीक्षाओं के बीच भी जारी रही, लोगों को मानसिक शक्ति और साहस प्रदान करती है। मां नंदा राजजात यात्रा, जिसे हिमालय का ‘कुंभ’ भी कहा जाता है, इस बात का प्रमाण है कि उत्तराखंड के लोग अपनी आस्था और परंपराओं के प्रति कितने समर्पित हैं। यह यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि विपरीत परिस्थितियों में भी हार न मानने की मानवीय भावना का प्रतीक है।
निष्कर्ष
उत्तराखंड सचमुच नदियों का राज्य है। यहाँ की नदियाँ जीवन का स्रोत हैं, सभ्यता की पालना हैं और आस्था का केंद्र भी। लेकिन ये हमें यह भी याद दिलाती हैं कि प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता सम्मान और सतर्कता का होना चाहिए। इस भूमि पर जीवन, नदियों के प्रवाह की तरह ही आगे बढ़ता है – कभी शांत और सौम्य, तो कभी उग्र और चुनौतीपूर्ण। लेकिन हर बार, यहाँ के लोग अपने विश्वास और हिम्मत से हर मुश्किल को पार कर जाते हैं।